• Sanjay Sinha

आज़ाद लज्जा

आज़ाद लज्जा -----------

मैं पटना से दिल्ली मामा के घर आया था। मामा सीबीआई में पोस्टेड थे और आरके पुरम में उन्हें सरकारी मकान मिला था। तब दिल्ली हमारे लिए बहुत दूर होती थी। मैं स्कूल में पढ़ता था और हम मामा के पास दिल्ली घूमने आए थे। बहुत पुरानी याद है। मुझे याद है कि मैंने अपनी ये वाली याद आपसे कभी साझा नहीं की। इस याद में ऐसी कोई कहानी नहीं थी जिस कारण इसे याद रखना ज़रूरी था, पर एक नसीहत थी, जिसकी वज़ह से मैं उस पुरानी याद को कभी भूला नहीं। संजय सिन्हा चाहें तो दो लाइन में पूरी याद को पिरो कर आपके सामने रख सकते हैं, पर पूरी बात विस्तार से नहीं बताने के कारण याद की मासूमियत, उससे जुड़ी लज्जा और नसीहत, तीनों के साथ न्याय नहीं होगा। इसलिए ज़रूरी है कि संजय सिन्हा अपने परिजनों के सामने पूरी याद को सिलसिलेवार और पूरी ईमानदारी से रखें। मैं पटना से दिल्ली आया था। मामा के घर उनके साढ़ू भाई भी उन दिनों आए हुए थे। मुझे नहीं पता कि मामा के साढ़ू को रिश्ते में हम क्या कहते, पर हम उन्हें चाचा कहते थे। शायद इसकी एक वज़ह ये भी रही होगी कि मामा के साढ़ू मेरे पिता के भी दोस्त थे। देखिए, आज जिन यादों को आपसे साझा कर रहा हूं, वो सचमुच एक व्यक्तिगत याद है। पर एक उम्र के बाद क्या व्यक्तिगत और क्या सार्वजनिक? जिन दिनों मैं पटना में था, हमारी जान-पहचान की एक लड़की यहां दिल्ली पब्लिक स्कूल, आरके पुरम में पढ़ती थी। नाम था चांदनी। मेरा यकीन कीजिए, तब श्रीदेवी की फिल्म चांदनी नहीं बनी थी, और हम सोच भी नहीं सकते थे कि चांदनी भी नाम होता है। पर उस लड़की का नाम था चांदनी। मैं उस लड़की को देखा भी नहीं था, पर सुना था कि चांदनी दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ती है। पटना के लिए दिल्ली बहुत दूर थी। दिल्ली पब्लिक स्कूल और भी दूर। हमने तो जिला स्कूल, सेंट्रल स्कूल, लालबहादुर शास्त्री स्कूल के नाम ही सुने थे। चांदनी और दिल्ली पब्लिक स्कूल की हमारे घर में खूब चर्चा होती थी। दोनों नाम मेरे जे़हन में ऐसे समा गए थे मानो संसार में सबसे सुंदर लड़की चांदनी है और संसार का सर्वश्रेष्ठ स्कूल दिल्ली पब्लिक स्कूल है। उन दिनों डीपीएस और जगह नहीं खुले थे। एक मथुरा रोड पर था, दूसरा आरके पुरम में। मैंने मथुरा रोड के बारे में नहीं सुना था, बस आरके पुरम के बारे में पता था। लोग दिल्ली कुतुब मीनार, लालकिला देखने आते थे, मैं आया था मन में मंसूबा लेकर कि डीपीएस आरकेपुरम देखूंगा। वहां चांदनी दिखेगी। मुझे ये भी नहीं पता कि चांदनी मुझसे बड़ी थी या छोटी या हमउम्र। पर मन में एक तस्वीर बन गई थी चांदनी की और डीपीएस की। मैं चांदनी की मां से पटना में एक बार मिला था। वो थोड़ी मोटी-सी, संभ्रांत महिला थीं। मुझे बिल्कुल पता नहीं कि वो मेरे मामा के साढ़ू की रिश्ते में किस तरह की बहन थीं, पर बहन थीं। उन्हीं के घरवालों के मुंह से मैंने चांदनी और डीपीएस की तारीफ सुनी थी। बाल मन आज़ाद होता है। आज़ाद मन कुछ भी सोच सकता है। आठवीं-नौवीं में पढ़ने वाले मन के पंख उगने लगते हैं। मेरे भी उगने लगे थे। चांदनी। डीपीएस आरकेपुरम। मैंने कहा न कि मैं मामा के घर आया था। और मामा के घर ही उनके साढ़ू भी आए थे। साढ़ू मतलब पिताजी के दोस्त और मेरे चाचा। चाचा चांदनी की मम्मी से फोन पर बात कर रहे थे। जब उन्होंने फोन रखा, तो मैंने अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए उनसे कहा कि आप चांदनी की मम्मी से बात कर रहे थे न? वो चौंके। उन्होंने पूछा कि तुम उन्हें जानते हो क्या? मैंने कहा, “हां, वो मोटी-सी महिला।” चाचा एकदम भड़क गए। उन्होंने मुझे वहीं डांटा, “तुम्हें किसने इतनी आज़ादी दी कि तुम किसी के बारे में ऐसा कहो? वो मेरी बहन हैं। तुमसे इतना ही पूछा था कि तुम उन्हें जानते हो? बस इतना कहना था कि हां, जानता हूं। इसमें मोटी-सी विशेषण लगाने को अनुमति किसने दी?” इतना कह कर वो चुप हो गए। मैंने खुद को बहुत लज्जित महसूस किया। मैंने कभी इस बारे में किसी से चर्चा नहीं की। फिर लगा कि चाचा ठीक ही कह रहे थे। चांदनी की चर्चा में खुद को समाहित करने के लोभ में मैंने उसकी मम्मी के बारे में अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर दिया था, जो सर्वथा अनुचित था। पता नहीं कितने साल बीत गए। पर मेरी वो लज्जा कभी मिटी नहीं। मैं जिसे जानता नहीं था, उसके बारे में मैंने कुछ भी कह दिया था। मुझे पहली बार ये नसीहत मिली थी कि जब तक आप किसी को ठीक से नहीं जानते, आपको उसके बारे में कुछ भी ऐसा कहने से बचना चाहिए, जो उचित न हो। बात खत्म हो गई थी। चाचा ने एक वाक्य में मुझे समझा दिया था कि किसी की निजता का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अब मैं फेसबुक पर लोगों के लिखे को पढ़ता हूं। कोई किसी के लिए कुछ भी लिख देता है। किसी लेखक के बारे में, किसी फिल्म स्टार के बारे में, किसी राजनेता के बारे में। क्यों? क्या लिखने वाले लोग इन सभी लोगों को जानते हैं? क्या कोई भी किसी को कुछ भी कह सकता है? वो भी बिना मिले? बिना जाने? मुझे लगता है कि सभी को हर विषय पर नहीं लिखना चाहिए। सभी को सभी के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणी भी नहीं करनी चाहिए। हर किसी को इतनी छूट नहीं मिलनी चाहिए कि कोई किसी को कुछ भी कह दे। याद रखिए, आज़ादी का मतलब ये बिल्कुल नहीं होता कि जो हमारे मन में है, उसे हम कहीं भी उगल दें। मैं पत्रकार हूं। इसके बावजूद मैं उस दिन के बाद से इस मर्यादा का पालन करता हूं कि किसी के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। जैसे अधिक कानून बनना कानून टूटने की वजह बन जाती है, उसी तरह किसी के लिए बिना जाने-समझे कुछ भी कह देना, लिख देना उस बात की अहमियत कम करे या न करे, पर लिखने वाले की अहमियत घटा देती है। ठीक वैसे ही,जैसे उस दिन मामा के साढ़ू के आगे मेरी अहमियत बौनी हो गई थी। मैंने इस याद को आपसे क्यों साझा किया है, आप समझते हैं। बात पूरी करते हुए ये भी बताता चलूं कि मैं आज तक कभी चांदनी से नहीं मिल पाया। हां, बहुत साल बाद मैं अपने बेटे को बिना किसी और स्कूल में फॉर्म भरे सीधे डीपीएस में दाखिला दिलाने ले गया था। मन में बहुत दिनों तक रहा कि चांदनी यहां पढ़ी है। मेरी पत्नी ने मुझे टोका भी था कि दिल्ली में इतने स्कूल हैं, डीपीएस ही क्यों? मैंने कहा था, “चांदनी ने यहां पढ़ाई की थी।” आगे पत्नी ने कुछ पूछा नहीं, मैंने कुछ कहा नहीं। पत्नी बचपन से समझदार है। वो जानती है कि क्या पूछना है, क्या नहीं? इंटरनेट के ज़माने में बहुत से लोगों से इसी समझदारी की उम्मीद है। क्या लिखना है और क्या नहीं, ये सभी को पता होना चाहिए। #SanjaySinha #ssfbFamily

140 views
  • srttnjopr5lqq3ttmf6t.jpg
  • White Facebook Icon
  • White YouTube Icon
  • White Twitter Icon
  • White Instagram Icon
Quick Links

About ssFBfamily

© 2018 by Sanjay Sinha

Developed by www.studymantrasolutions.com