• Sanjay Sinha

उम्मीद से होना

बहुत साल पहले मेरे ऑफिस में काम करने वाली एक महिला मुझे बता रही थी कि शादी के कई साल बाद तक वो मां नहीं बन पाई थी। उसे लगने लगा था कि वो अब कभी मां बन ही नहीं पाएगी।

शादी के बहुत साल बीत जाने के बाद आस-पास के लोग भी बोलने लगे थे कि अब वो कभी मां नहीं बन सकती है।

महिला बता रही थी कि उसके मन में भी यही बात बैठ गई थी। कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी उसके पांव भारी नहीं हुए, वो उम्मीद से नहीं हो सकी।

एक दिन उसकी सास उसे किसी मंदिर में लेकर गई थी, ये कहते हुए कि यहां भगवान के दर्शन करने से महिलाओं की गोद भर जाती है। यहां मन्नत मानने से हर हाल में गोद भरती है।

महिला पत्रकार थी। विश्वास अंधविश्वास के फर्क को समझती थी। सास के साथ वो मंदिर गई। वहां उसे कई लोग मिले, जिन्होंने उससे कहा कि देवी के आशीर्वाद से उनकी गोद भर गई।

महिला के मन में एक पल को ये ख्याल आया कि क्या सचमुच ऐसा हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो वो फिर दुबारा यहां आएगी।

वो मुझे बता रही थी कि शादी के बाद पहली बार उसके मन में क्षण भर के लिए ये ख्याल आया था कि वो मां बन सकती है। शादी के बाद शुरू में उसने मां बनने के बारे में सोचा ही नहीं था। कुछ साल बाद जब उसने सोचा भी तो मन में ये बात बैठ गई थी कि वो मां बन ही नहीं पाएगी।

पर उस दिन मंदिर में उसे एक पल के लिए पता नहीं क्यों ये भरोसा हुआ कि वो भी मां बन सकती है।

मेरा यकीन कीजिए, संजय सिन्हा आपको कभी अंधविश्वास की कहानी नहीं सुनाएंगे। ये कहानी सिर्फ विश्वास की है।

उस दिन उस महिला के मन में पहली बार उम्मीद जगी और जब वो घर लौट कर आई तो कुछ ही महीनों में उम्मीद से हो गई।

महिला बता रही थी, “संजय जी, साल भर के भीतर मैं मां बन गई। ये सब कुछ एक क्षण के उस भरोसे से हुआ, जो भरोसा मेरे मन में उपजा कि मैं मां बन सकती हूं। अब तो ज़रूर बनूंगी, क्योंकि देवी मां के मैंने भी दर्शन कर लिए हैं।”

कल जब मैं जबलपुर में सुधीर अग्रवाल जी मिला तो वो बता रहे थे कि वो यहां नर्मदा वो हर कार्तिक पूर्णमा को नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा का आयोजन कराते हैं। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ मां नर्मदा के दर्शन को उमड़ती है।

रुकिए। मुझे लग रहा है कि आपके मन में ये सवाल उठ रहा है कि सुधीर अग्रवाल कौन हैं?

सुधीर अग्रवाल जबलपुर में रहते हैं और नर्मदा मइया के भक्त है। एक भाई वैद्य हैं, एक भाई वकील। इन्होंने अपना जीवन नर्मदा मइया को समर्पित कर दिया है।

तीनों भाइयों का परिवार, मां सब एक साथ रहते हैं। रोज़ बीस लोगों का खाना घर में बनता है। सोलह तो अपने परिवार के सदस्य हुए, बाकी चार मेहमान तो रोज़ उनके घर आते ही हैं।

मैं इनके घर गया था। पूरे परिवार से मिल कर आया।

संपूर्ण संयुक्त परिवार।

कभी न कभी पूरे परिवार की कहानी भी आपको सुनाऊंगा। पर अभी मैं उसे सुनाने बैठा तो उसी में उलझ जाऊंगा।

अभी मुझे कहानी सुनानी है उम्मीद की।

सुधीर अग्रवाल जी मुझे बता रहे थे कि नर्मदा पंचकोशी परिक्रमा से उन्होंने किन्नरों को भी जोड़ा है। और पिछले कुछ साल में उन्होंने उम्मीद की एक नई लौ जलाई है -बहनों की गोद भराई कार्यक्रम शुरू करके।

“बहनों की गोद भराई? ये क्या है?”

“संजय जी, जिन बहनों की गोद सूनी रह जाती है। जो उम्मीद की सारी किरणों से दूर हो जाती हैं, वो यहां आती हैं। हमारे यहां पुरानी मान्यता है कि हिजड़ों के आशीर्वाद से बहनों की गोद आबाद हो जाती है तो हमने एक कार्यक्रम शुरू किया जिसमें किन्नर बहनें इन्हें आशीर्वाद देती हैं। नर्मदा घाट पर गोद भराई की पूजा होती है। और पिछले कुछ साल में चार सौ से अधिक उन बहनों की गोद आबाद हुई है, जिन्होंने उम्मीद की हर किरण छोड़ दी थी।

ऐसी महिलाओं की गोद आबाद हुई है, जिनकी शादी के दस-पंद्रह साल हो चुके थे और वो मां नहीं बन पाई थीं।”

सुधीर अग्रवाल जी जब ये कह रहे थे, मुझे मेरे ऑफिस की मेरी पत्रकार साथी याद आ रही थी। मातृत्व तन का नहीं, मन का भाव है। सेकेंड के हजारवें पल में भी अगर उम्मीद की किरण जग जाए तो शरीर में साकारात्मक ऊर्जा संचालित होने लगती है। ये ऊर्जा होती हमारे भीतर है, पर उसे जगाने के लिए कभी दवा तो कभी दुआ काम आती है।

मैं चुप था। ये विज्ञान का युग है। अंधविश्वास का ज़माना नहीं रहा।

पर मैंने शुरू में ही आपसे कहा था कि आज मैं विश्वास की कहानी आपको सुनाऊंगा। ये सच है कि सुधीर जी जो कह रहे थे कि चार सौ उन बहनों की गोद भर गई, जो मां नहीं बन पा रही थीं। असल में दुआ, पूजा कुछ भी नहीं। ये सारा खेल है विश्वास का, उम्मीद का। जब आप पत्थर से भी उम्मीद कर लेते हैं, उस पर भरोसा जता देते हैं तो पत्थर में भगवान आ जाते हैं।

मैं उम्मीद के पत्थर की कहानी भी आपको सुनाऊंगा, पर अभी तो इस सच पर यकीन कीजिए कि भरोसे में बहुत शक्ति होती है। भरोसे से बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। भरोसे से हर मुराद पूरी हो जाती है।

ज़िंदगी नाम है भरोसे का। ज़िंदगी नाम है उम्मीद का। आप अपने मन से कभी उम्मीद की लौ को मत बुझने दीजिएगा।

उम्मीद की लौ को जगा कर आप जो मांगेंगे, वही मिलेगा। कभी आजमा कर देख लीजिएगा। उम्मीद का संसार ऐसा ही है।

उम्मीद मन में घटने वाली एक ऐसी घटना है, जो असंभव को भी संभव में तब्दील कर देती है।

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