• Sanjay Sinha

एक दिन



एक दिन ——— वो भागे जा रहे हैं। हम सब भाग रहे हैं। हम सारा दिन जीने की तैयारी में व्यस्त हैं। इतना कि जीने की फुर्सत ही नहीं। क्यों भाग रहे हैं, नहीं मालूम। कहां भाग रहे हैं, ये भी नहीं मालूम। मालूम है तो इतना कि भाग रहे हैं। एक दिन जी लेंगे। एक दिन वो करेंगे, जो करना चाहते हैं। संजय सिन्हा ने कई लोगों से पूछा कि करना क्या चाहते हैं, तो उन्होंने कहा कि जीना चाहते हैं? जीना क्या होता है? नहीं मालूम। जो सब कर रहे हैं, हम भी कर रहे हैं। पर ये तो जीना नहीं हुआ। ओह! संजय सिन्हा, सुबह-सुबह इतनी गंभीर बातें? हां, कभी-कभी मैं भारी सोच में पड़ जाता हूं कि हम क्या कर रहे हैं? हम क्या चाहते हैं? मेरे एक मित्र, जिन्हें पैसों की इतनी ज़रूरत नहीं, पत्नी और बच्चों को दूसरे शहर में छोड़ कर दिल्ली में नौकरी करते हैं। जितने पैसे मिलते हैं, सब यहीं खर्च हो जाते हैं। हर हफ्ते शुक्रवार की रात सारी रात ट्रेन के धक्के खाते हुए घर जाते हैं, फिर रविवार को वहां से चल देते हैं। कई साल से यही चल रहा है। पत्नी और बच्चे दूसरे शहर में। वो यहां। मजबूरी ऐसी है कि पत्नी और बच्चों को यहां ला नहीं सकते, खुद वहां रह नहीं सकते। मैं पूछता हूं कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? वो कहते हैं कि सब कर रहे हैं, इसलिए। आदमी को कुछ तो करना होगा। क्या इसमें खुशी मिलती है? नहीं मालूम। मैंने समझाया कि ये कुछ करना नहीं है। अगर पैसों की ज़रूरत नहीं, तो वो कीजिए जिसे करने से खुशी मिले। और कुछ नहीं तो ज़िंदगी ही जी लीजिए। अपना समय बच्चों और पत्नी के साथ गुजारिए। ऐसे तो समय गुजर जाएगा, ज़िंदगी नहीं जी पाएंगे। उन्हें लगता है कि आदमी कमाने के लिए पैदा होता है। कहते हैं कि हम स्कूल गए, कॉलेज गए, हमें जीवन जीने का पाठ कभी पढ़ाया ही नहीं गया। हमारे सिलेबस में ऐसा कोई पाठ्यक्रम नहीं था। हम तो नर्सरी से यही पढ़ते और समझते आ रहे हैं कि हमें बड़ा होकर कमाना है। कमा कर जीना है। तो अब जीना शुरू कर दीजिए। संजय जी, यही नहीं पता कि जीना क्या होता है? नौकरी करना, हर महीने सैलरी पाना ही तो जीना है। कैसे समझाऊं कि जीवन का सिलेबस ये नहीं है। मैं ऑफिस के नीचे किसी के साथ खड़ा था। थोड़ी हवा खाने के लिए। मेरे एक साथी ने कहा कि चाय पी लेते हैं। हम चाय पीने लगे। वहां एक आदमी सड़क पर पोहा बेच रहा था। कई लोग आ रहे थे। खुले में खड़े पोहा वाले से पोहा खरीद कर खा रहे थे। दो लोग आए। दोनों ने पोहा आर्डर किया। एक ने एक प्लेट खाने के बाद दूसरे प्लेट का ऑर्डर किया। मैं देख रहा था। वो भूखा था। दोनों वहीं किसी ऑफिस में काम करते होंगे। जैसी मेरी आदत है, मैंने पूछ लिया कि आपको पोहे इतने पंसद हैं क्या? वो हंसने लगा। बिल्कुल पसंद नहीं। पर क्या करें, भूख लगी है। सुबह से कुछ खा नहीं पाया। दोपहर में लंच तक का समय नहीं मिल पाता है। इतना काम है। एक बार लंच का समय निकल गया, फिर हमारे ऑफिस में कुछ नहीं मिलता। अब यही मिल रहा है, तो यही खा रहा हूं। पर ये तो सही नहीं है। आप अपने हेल्थ के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जानता हूं। पर विकल्प क्या है? परिवार यहां नहीं रहता। मैं अकेला हूं। खुद खाना बनाने का समय भी नहीं। काम बहुत है। बहुत काम? किसके लिए? पता नहीं। बस सब काम कर रहे हैं। मैं भी काम कर रहा हूं। पैसे कमा रहा हूं। क्या कीजिएगा पैसों का? वैसे तो अपना घर है, अपने शहर में। पर मैं दिल्ली में एक फ्लैट लूंगा। उसके लिए पैसे जुटा रहा हूं। पर आप लंच नहीं करेंगे, डिनर भी शायद नहीं कर पाएंगे। ऐसे कब तक चलेगा? फिर क्या कीजिएगा फ्लैट का? कौन रहेगा उसमें? वो हंसने लगे। भाई साहब आप तो बहुत बड़ी बात कह रहे हैं। इतना सोचने का समय भी किसके पास है? हम तो तैयारी कर रहे हैं। जीने की तैयारी। मैंने उन्हें बधाई दी कि एक दिन आपका समना पूरा हो। आप ठीक से जी पाएं। पर खाना समय पर खाएंगे तभी जी पाएंगे। समय पर खाना खाइए। समय पर सोइए। समय पर टहलिए। जीवन जीना है, तो पहले उसकी बुनियादी शर्तें पूरी कीजिए। जितना समय मिले, जीने की कोशिश कीजिए। ऐसे भागने से क्या मिलेगा? ज़मीन नापने का कोई फायदा नहीं। ज़मीन भी हंसती है कि न जाने कितने आए, नापते-नापते चले गए। पता नहीं था कि रहने के लिए, जीने के लिए कितनी ज़मीन की ज़रूरत होती है। कभी-कभी मैं बहुत सोचता हूं। मैं चाहता हूं कि आप भी सोचें। समझें कि जीवन क्या है? जीना क्या है? ऐसे भागते रहने से क्या मिलेगा? एक दिन? वो दिन? वो एक दिन किसी की ज़िंदगी में कभी नहीं आता। वो दिन कुछ नहीं होता। जो है, आज है। उसे ही जीना होता है। जीना और कुछ भी हो सकता है, पर भागना नहीं होता। #SanjaySinha #ssfbFamily

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