• Sanjay Sinha

खून बन जाएगा पानी

खून बन जाएगा पानी ---------------- कभी-कभी चुटकुले सच हो जाते हैं। बचपन में एक चुटकुला सुना था, पहले उसे सुन लीजिए, फिर संजय सिन्हा आपको बताएंगे कि चुटकुला सच कैसे हो गया। एक सेठ जी ने अपने बच्चे को घर में ट्यूशन पढ़ाने के लिए एक टीचर रख लिया। टीचर रोज़ आता, बच्चे को पढ़ाता। पर बच्चा स्कूल की परीक्षा पास नहीं कर पा रहा था। सेठ जी को चिंता हुई। बच्चा प्राइवेट ट्यूशन पढ़ रहा है, फिर भी परीक्षा पास नहीं कर पा रहा, समस्या कहां है? सेठ जी ने तय किया कि वो छिप कर टीचर को पढ़ाते देखेंगे। अगले दिन सेठ जी उस कमरे में पलंग के नीचे छिप गए, जिसमें मास्टर साहब बच्चे को पढ़ाते थे। मास्टर साहब ने बच्चे को अंग्रेजी पढ़ानी शुरू की। “बी एल ओ ओ डी ब्लड। ब्लड मतलब पानी।” ब्लड मतलब पानी? सेठ जी चौंके। ये क्या? मास्टर साहब बच्चे को गलत अंग्रेजी पढ़े रहे हैं? ब्लड का मतलब तो खून होता है और ये मेरे बच्चे को पानी समझा रहे हैं। ठहरो, अभी ख़बर लेता हूं मास्टर की। सेठ जी पलंग के नीचे से निकले और मास्टर पर बरस पड़े। “मास्टर साहब, ये क्या? आप बच्चे को ब्लड का मतलब पानी पढ़ा रहे हैं? शर्म नहीं आती गलत पढ़ाते हुए?” मास्टर साहब बिल्कुल नहीं घबराए। उन्होंने इत्मीनान से सेठ जी को जवाब दिया, “सेठ जी, आप जितने पैसे मुझे देते हैं, उसमें तो ब्लड का मतलब पानी ही होता है, खून नहीं। इतने कम पैसों में खून हो ही नहीं सकता।” बचपन में जब संजय सिन्हा ने ये वाला चुटकुला सुना था तो पेट पकड़-पकड़ कर हंसे थे। क्या मास्टर साहब थे। कल अखबार में एक खबर पर नज़र पड़ गई। गाजियाबाद के एक गर्ल्स कॉलेज की छात्राओं ने नोट किया कि उनके टीचर रोज़ पढ़ाने नहीं आते। आते हैं तो मटरगश्ती करके चले जाते हैं। क्लास में बहुत कम आते हैं। लड़कियों को लगा कि इस तरह तो उनका सिलेबस अधूरा रह जाएगा। वो परीक्षा में फेल हो जाएंगी। लड़कियों ने कॉलेज के प्रिंसिपल से शिकायत की कि टीचर रोज़ नहीं आते। आते हैं तो पढ़ाते नहीं। प्रिंसिपल मैडम तो और कमाल की निकलीं। छात्राओं की शिकायत पर मुस्कुरा कर रह गईं। छात्राओं को गुस्सा आ गया। वो कलेक्ट्रेट पहुंच गईं। वहां उन्होंने अधिकारियों से शिकायत की कि उनके कॉलेज में टीचर नियमित नहीं आते। आते हैं तो क्लास नहीं लेते। इससे उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। कलेक्टर ने प्रिंसिपल को बुलाया। टीचर को बुलवाया। “क्योंजी, आप पूरी क्लास क्यों नहीं लेते? छात्राओं का भविष्य चौपट करने का इरादा है क्या?” कलेक्टर की फटकार के बाद तो प्रिंसिपल और सभी टीचर हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। प्रिंसिपल ने धीरे से कहा, “ये छात्राएं जितनी फीस देती हैं, उसमें तो टीचर इतनी ही क्लास ले पाएंगे। इतने कम पैसे इनसे मिलते हैं कि हम टीचर को पूरी सैलरी नहीं दे पाते। ये बेचारे कभी यहां आते हैं, कभी किसी और कॉलेज। क्या करें?” प्रिंसिपल की दलील सुन कर हो सकता है आप पेट पकड़ कर हंसें। पर संजय सिन्हा नहीं हंस रहे। यही हमारे देश का हाल है। हमारे यहां एक क्लर्क को भी टीचर से अधिक मान-सम्मान मिलता है। मुझे नहीं पता कि ऐसा जानबूझ कर किया गया है या अनजाने में हो गया। मैं अमेरिका में रहा हूं। मैंने देखा है कि वहां सबसे अधिक सम्मान की नौकरी शिक्षक की होती है। चाणक्य ने नंद के महल को यही कह कर छोड़ दिया था कि राजन, जहां शिक्षक की इज़्जत नहीं, उस राज्य का पतन निश्चित है। शिक्षक होना बहुत बड़ी बात होती है। शिक्षा का मोल इतना है कि पूरा राज्य भी उसके आगे छोटा पड़ जाए। पर अफसोस कि मेरे चुटकुले वाले सेठ जी भी शिक्षक को कम पैसे देते थे। नतीजा उनका बच्चा ब्लड का मतलब पानी पढ़ रहा था। गाजियाबाद के कॉलेज में भी टीचर को कम पैसे मिलते थे। नतीजा छात्राओं का सिलेबस आधा ही रह गया। मेरी आज की कहानी पढ़ कर हंसिएगा नहीं। सोचिएगा। ये चिंता का विषय है। संजय सिन्हा की ये बात याद रखिएगा कि जहां शिक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाता, वहां खून पानी बन जाता है। #SanjaySinha #ssfbFamily

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