• Sanjay Sinha

जो थम गए, वो कुछ नहीं

Updated: Nov 24, 2018


------------------- “मेरी जेब में पांच फूटी कौड़ियां नहीं हैं और मैं पांच लाख का सौदा करने आया हूं।” 1978 में हिंदुस्तान के रुपहले पर्दे पर जब अमिताभ बच्चन मिस्टर आर के गुप्ता से ये कह रहे थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि बिना पांच फूटी कौड़ियों के कोई पांच लाख का सौदा करने की सोच भी सकता है। पर कोई था जो ऐसा सोच सकता था। तब नहीं, अमिताभ बच्चन के ऐसा कहने के बीस साल बाद। जी हां, ठीक बीस साल बाद। आइए, आज संजय सिन्हा के साथ आप फिल्मी फंतासी-सी कहानी के एक ऐसे संसार में चलिए, जहां हीरो कुछ कहता नहीं, पर उसके किए को दुनिया कहती फिर रही है।

साल 1999, शहर का नाम अंबाला। 23 साल का एक नौजवान, जिसके सपनों ने जगना शुरू ही किया था कि उसकी दुनिया सो गई। उसके पिता इस संसार को अचानक अलविदा कह गए। बहुत मनहूस सुबह थी वो। चंडीगढ़ के अपने बंगले में उस तारीख को याद करते हुए संजीव जुनेजा ने मुंह घुमा कर अपनी आंखें पोछीं और धीरे से कहा, “संजय जी, उस दिन मेरी दुनिया खत्म हो गई थी। मेरे पिता इस संसार से चले गए थे। यूं ही एक सुबह दिल की धड़कन रुक गई। “मेरे पिता अंबाला में आयुर्वेदिक डॉक्टर थे। घर में सब कुछ वही थे। मेरा करीयर तब शुरू नहीं हुआ था। अभी सोचना शुरू ही किया था कि क्या करूंगा जीवन में। अचानक एक सुबह घर की खुशियों ने मुंह मोड़ लिया। मां, मैं और मेरी छोटी बहन। हम क्या करेंगे? कहां जाएंगे? घर कैसे चलेगा? एक हज़ार सवालों ने पूरे घर को जकड़ लिया।

“मेरे पास कुछ नहीं था। घर में ही पिता का एक कमरे का अपना दवाखाना था। पिता की मृत्यु के बाद मेरे सिर पर पगड़ी बांध दी गई कि घर का बेटा ही घर को देखेगा। “मैं पिता के उस कमरे में गया, जहां बहुत-सी औषधियां पड़ीं थीं। मैंने पिता को काम करते देखा था। वो रोज़ कुछ न कुछ प्रयोग करते थे। नया करते थे। मुझे नहीं पता था कि मैं क्या करूंगा, पर इतना तय कर चुका था कि वो नहीं करूंगा जो दुनिया करती है। कुछ अलग करूंगा। जीवन का व्याकरण खुद लिखने की ठान चुका था। पर रास्ता नहीं सूझ रहा था।”

मैंने संजीव जुनेजा जी को टोका, “शेर, शायर और सपूत अपने लिए रास्ता खुद तलाशते हैं।” “शायद आप ठीक ही कह रहे हैं। मैंने इतना सोच लिया था कि कुछ अच्छा करूंगा। क्या करूंगा, पता नहीं था। पर उस समय मैंने पिता के दवाखाने में जाना शुरू कर दिया। आयुर्वेद तो जन्म से रग-रग में बसा था। मैंने जड़ी-बूटियों को और समझना शुरू किया। पता नहीं क्या-क्या करता रहा। आज याद करने बैठूंगा तो रो पड़ूंगा। कैसे हमने घर चलाया। अब उन यादों से गुजरने का भी मन नहीं करता। पर यादें तो यादें हैं।

“संजय जी, मेरी शादी हो गई। मेरी धर्मपत्नी सारा ने टूटे बिखरे संजीव को फिर जोड़ा। परिवार बढ़ गया। पर अभी न मुझे रास्ते का पता था, न मंजिल का।” इतना कह कर जुनेजा जी थोड़ी देर के लिए रुके। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “छोड़िए, कहानी तो चलती रहेगी। आप क्या लेंगे? नारियल पानी?” “हां ठीक है। चंडीगढ़ में नारियल पानी।”

“संजय जी, मुझे अपने बालों से बहुत प्यार था। जब मैं नहाता था तो कुछ बाल झड़ते थे। मुझे लगा कि कहीं एक दिन मैं गंजा तो नहीं हो जाऊंगा। एक सुबह नहाते हुए मेरे मन में ये ख्याल आया और मैं बाथरूम में ही शीशे के सामने खड़ा हो गया। जैसे चित्रलेखा फिल्म में एक सफेद बाल देखकर मीना कुमारी ने जीवन के सत्य को समझ लिया था कि एक दिन उसके सारे बाल सफेद हो जाएंगे, फिर वो बूढ़ी हो जाएगी और फिर…। मैंने उस दिन खुद को आईने के सामने गंजा देखा। यकीन कीजिए, मैं डर गया। फिर मुझे लगा कि पिता की दी विरासत मेरे पास है। क्यों नहीं मैं खुद शोध करूं, ये पता करूं कि क्या गिरते हुए बालों को रोका जा सकता है? 2008 की बात है, जब मुझे एक फॉर्मूला मिला, जिससे गिरते बाल रुक सकते थे। मेरे पास कुछ भी नहीं था। मेरा शोध था। मेरा फॉर्मूला था। बस। मैंने तेल बनाया, शीशी में भरा और उसे बेचने निकल पड़ा। पर कौन खरीदता है ऐसे किसी का तेल? उन दिनों तो बाल झड़ने से रोकने के लिए कई तेल बाज़ार में थे, फिर मेरे तेल की क्या बिसात? मैंने बहुत सोचा। फिर मैंने तेल को एक नाम दिया। केश किंग। “केश किंग क्यों? केश क्वीन क्यों नहीं? बालों के गिरने की समस्या लड़कियों के लिए बड़ी होती है।” “हां, सोचा था मैंने। शुरू में मैंने केश क्वीन ही सोचा था। असल में केश क्वीन सोचने के पीछे एक और वजह थी। वजह ये कि इस तेल से न सिर्फ बालों का झड़ना रुक रहा था, बल्कि बाल लंबे भी हो रहे थे। पर लगा कि क्वीन नाम दूंगा तो लड़के तो तेल छुएंगे भी नहीं। पर किंग नाम रहेगा तो लड़कियां लगा लेंगी। लड़कियों का ईगो लड़कों से कम होता है। बस मैंने नाम रख दिया केश किंग। मैं खुद तेल शीशी में भरता। दुकानों में जाता। दुकानदारों को समझाता, गिड़गिड़ाता कि भाई अपने पास रख लो। बिक जाए, फिर पैसे देना। मेरा फॉर्मूला सही था। जब बाकी तेल बेचनेवाले ये कह रहे थे कि उनके तेल से बालों में चिपचिपापन नहीं होता, तब मैं कह रहा था कि केश किंग से बाल चिपचिपे होंगे। तेल की खासियत ही बालों को चिपचिपा करना है। पर इस तेल को लगाएंगे तो बाल झड़ना रुक जाएगा। बाल लंबे हो जाएंगे। मैं ही तेल बेचता। मैं ही प्रचार करता। संजय जी…" संजीव जुनेजा का गला थोड़ा-सा रुंधा। “पता नहीं आपसे इतनी बातें क्यों साझा कर रहा हूं। पर कुछ तो कनेक्ट कर रहा है आपसे। "मैं हाथ से पर्चे बनाता-'अगर आपको लगता है कि आपके बाल गिर रहे हैं, तो आप केश किंग तेल लगाएं।' "पर्चे शहर में चलने वाले ऑटोरिक्शा पर चिपकाता। दीवारों पर चिपकाता।

“एक शीशी बिकी। दूसरी शीशी बिकी। फिर तो मुंह से प्रचार चल पड़ा। जिसने एक बार लगा लिया, वो लगाने लगा। केश किंग की मांग बढ़ने लगी। इतनी कि मैं अकेले उतना तेल नहीं बना सकता था। मेरे पास कुछ पैसे आए। फिर मैंने किसी तरह प्रोडक्शन बढ़ाया। “और मांग बढ़ी। और तेल बिका। “अब समय आ गया था कि मैं बड़े स्तर पर केश किंग तेल का उत्पादन करूं। “मैंने हिमाचल प्रदेश में एक तेल बनाने की एक फैक्ट्री लगा ली। मेरा तेल चल निकला। मेरे पास कोई सेल्स टीम नहीं थी। बस उत्पादन और लोगों के कहने से बिक्री। जिसने एक बार केश किंग तेल लगाया, उसने दूसरा कोई तेल लगाना छोड़ दिया। “अब मैं समझ चुका था कि यही मेरा रास्ता है, यही मेरी मंज़िल। “मुझे लगा मुझे लोगों की रोजमर्रा की ज़रूरतों को समझना है, उनके लिए उत्तम चीज़ ढूंढनी है। “मैंने कई बुजुर्गों को घुटने में तकलीफ से तड़पते देखा था। मैंने कई महिलाओं को चेहरे पर कील-मुंहासे और दूसरे दागों की वजह हीन भावना से भरते देखा था। “मुझे लगा कि इस दिशा में आयुर्वेद पर शोध की ज़रूरत है। मैंने और शोध किया। और फिर निकल कर सामने आया डॉक्टर ओर्थो, घुटने के दर्द के लिए रामबाण। चेहरे के दाग-धब्बों को मिटाने के लिए निकल कर आया रूपमंत्रा। “मेरे सभी उत्पाद गुणवत्ता की कसौटी पर एकदम खरे थे। खरी चीज़ें बिकती हैं। झूठ की पोल खुल जाती है। मैंने कोई दावा नहीं किया। “लोगों ने इस्तेमाल किया, परखा और खुद ही मेरे उत्पादों का प्रचार करने लगे। मैंने कई सौ करोड़ का कारोबार किया।

“और एक सुबह मेरे पास ऑफर आया कि क्या आप अपना हेयर केयर बिजनेस केश किंग ब्रांड शोध सहित बेचेंगे? मैं हैरान था। तब इतनी समझ नहीं थी कि ब्रांड नाम की भी कीमत होती है। ऑफर अब कई कंपनियों की ओर से आ रहा था। पर डील तय फाइनल हुई इमामी कंपनी से। “बहुत सोचा। इमामी कंपनी का बहुत नाम था। वो लोग हर्बल उत्पाद बनाते थे। जब उनकी ओर से ऑफर आया तो मुझे लगा कि बेच देते हैं। इमामी अच्छी कंपनी है। मेरे उत्पाद को नया आयाम मिलेगा। और मैंने यह सब उन्हें दे दिया। वो इतनी बड़ी डील थी कि मैं खुद हैरान था।

“भारत के इतिहास में एफएमसीजी सैक्टर की दूसरी सबसे बड़ी डील। “संजय जी, मेरी जेब में पांच फूटी कौड़ियां नहीं थीं और मैं मिलियंस डॉलर की डील कर रहा था।" संजीव जुनेजा इतना कह कर रुके।

संजय सिन्हा के कानों में सिनेमा हॉल की तालियां गड़गड़ाने लगीं।

संजीव जुनेजा बोल रहे थे। मैं सुन रहा था। “आज मेरे पास सब कुछ है। बंगला, गाड़ी, बैंक बैलेंस। सब कुछ। बस पिता नहीं हैं। पिता की बहुत याद आती है। आप यकीन न करें शायद, अपने पिता के निधन के पांच साल बाद तक मेरी सुबह की शुरुआत रोज़ एक चिट्ठी से होती थी। मैं एक चिट्ठी अपने पिता के नाम लिखता था। अपने दिल की बातें रोज़ उनसे पत्र में कहता। पत्र अपने पास रख लेता। पता नहीं क्यों मुझे लगता था कि पिता तक मेरे शब्द पहुंच जाते हैं और मेरे पिता मेरे सवालों का जवाब मुझ तक पहुंचा देते हैं। आज भी मैं सुबह बिस्तर से उठ कर सबसे पहले अपने पिता को प्रणाम करता हूं। बिना बड़ों के आशीर्वाद के आदमी कुछ हासिल नहीं कर सकता।” मैंने देखा, सामने संजीव जुनेजा के पिता की एक मूर्ति थी। मैंने याद किया, अभी मैं जब संजीव जी के ऑफिस गया था तो वहां उनके कमरे में भी यही मूर्ति लगी थी, और उसके सामने एक झिलमिलाता दीया। मतलब संजीव जी सुबह-शाम अपने पिता को याद करते हैं।

मेरे पास पूछने को कुछ नहीं बचा था। मैंने सिर्फ इतना ही कहा था, “भगवान ने आपकी सुन ली। आप बहुत बड़े आदमी बन गए हैं, संजीव जी।” संजीव जी मुस्कुराए। फिर उन्होंने कहा, संजय सिन्हा जी, इतना तो आप भी जानते हैं कि मकान ऊंचा होने से इंसान ऊंचा नहीं हो जाता। मैं बड़ा नहीं हुआ हूं। मैंने तो बड़ों के आशीर्वाद की छांव तले बस जीना सीख लिया है। मैंने सीख लिया है कि ज़िंदगी जैसी भी हो, खुश रहना आना चाहिए। बने बनाए रास्तों पर तो कोई भी चल सकता है, अपने लिए रास्ता बनाना आना चाहिए। मैं भी बस अपने लिए रास्ते बना रहा हूं। "एक रास्ता है ज़िंदगी, जो थम गए, वो कुछ नहीं।" #SanjaySinha #ssfbFamily

0 views

Recent Posts

See All

बड़ा होना

नरेश ग्रोवर भैया अपने दोस्त के साथ एक उद्योगपति से मिलने गए थे। मैं जानता हूं कि आप तुरंत पूछ बैठेंगे कि नरेश ग्रोवर भैया कौन? देखिए, आप अपने परिजन हैं और आपको हक है मुझसे कुछ भी पूछने का। और मुझे अच्

यही है हमारी किस्मत

यही है हमारी किस्मत ----------------- मेरे नाना नहीं चाहते थे कि मामा पुलिस की नौकरी में जाएं। पर किस्मत मामा को पुलिस की नौकरी में ही लेकर गई। मामा ने यूपीएससी की परीक्षा दी और आईपीएस अधिकारी बन गए।

  • srttnjopr5lqq3ttmf6t.jpg
  • White Facebook Icon
  • White YouTube Icon
  • White Twitter Icon
  • White Instagram Icon
Quick Links

About ssFBfamily

© 2018 by Sanjay Sinha

Developed by www.studymantrasolutions.com