• Sanjay Sinha

जुनून, हौसला और अनुभव

Updated: Nov 24, 2018

जुनून, हौसला और अनुभव --------------------


विजय भैया की जब शादी हुई थी तो उनके घर सिर्फ भाभी नहीं आई थीं। भाभी अपने साथ भैया के लिए मरफी का रेडियो, एचएमटी की घड़ी और एवन की साइकिल साथ लाई थीं। विजय भैया हमारे किस तरह के भैया थे, तब मुझे ठीक से रिश्तों का ताना-बाना नहीं पता था, पर दीदी पड़ोस में रहने वाले विजय भैया को भैया कहती थी, तो वो मेरे भैया हो गए। मैं विजय भैया की शादी में नहीं गया था। भाभी जब डोली से उतरीं तब मेरा मन मचला था कि मेरी शादी हो जाए! घड़ी और रेडियो में अपनी दिलचस्पी नहीं थी, पर साइकिल चाहिए थी। एवन साइकिल। काले रंग की, ऊंची सीट वाली उस साइकिल को देख कर मेरा मन शादी के लिए मचल उठा था। मेरे पास अपनी साइकिल होगी, मैं उसे चला कर स्कूल जाऊंगा। मैंने मन में सोच लिया था कि जब मेरे पास साइकिल होगी तो मैं उस पर लाल रंग की ऊंची-सी गद्दी लगवाऊंगा। आगे डंडे पर अपने छोटे भाई को बिठाऊंगा और पूरे शहर का चक्कर लगाऊंगा। मैंने पिताजी से कहा था कि आप मेरी शादी करा दीजिए। पिताजी चौंके थे। “शादी? पर क्यों?” विजय भैया को शादी में साइकिल मिली है। मुझे भी साइकिल मिलेगी। पिताजी हंस पड़े थे। अगले दिन पिताजी साइकिल खरीद लाए थे। कह रहे थे साइकिल के लिए शादी थोड़े न की जाती है? पिताजी बहुत अच्छे थे। बिना शादी के ही मेरे पास साइकिल आ गई थी। सारी रात मैं सोया नहीं था। न जाने नींद में कितनी बार अपनी साइकिल को जाकर छूता था। पूरे शहर में टिन-टिन घंटी बजाता हुआ फुर्र-फुर्र चला जाता था। मेरी साइकिल। मेरी साइकिल। मेरी सबसे बड़ी दौलत। स्कूल में शोर मच गया था। संजू के पास नई साइकिल आ गई है। एक-एक कर सभी दोस्तों ने साइकिल चलाई। मेरा दिल धक-धक कर रहा था, कहीं मेरी साइकिल खराब न हो जाए। पहली बार मुझे अहसास हुआ था कि अपनी चीज़ क्या होती है। इससे पहले घर की सारी चीजें पिताजी की थीं। पर साइकिल मेरी थी। मेरी साइकिल। एवन साइकिल। दोस्त ज्ञान उड़ेलने लगे थे। किसी के पास हीरो साइिकल थी। किसी के पास हर्क्यूलस। पर मेरे पास थी एवन साइकिल। मेरी ये यादें पटना की हैं। पटना से मैं भोपाल चला गया। साइकिल वहीं छूट गई। मैंने अपनी संपति अपने छोटे भाई को दे दी थी। मैं भोपाल गया, वहां मामा बड़े पुलिस अधिकारी थे। घर में कई गाड़ियां थीं। पर मेरे मन से साइकिल का क्रेज़ नहीं गया था। मैंने वहां मामा से एक साइकिल खरीदवा ली और फिर एमए तक की पढ़ाई उसी साइकिल पर हुई। मैं नौकरी करने भोपाल से दिल्ली चला आया। मेरी शादी हो गई। शादी की उम्र तक पहुंच कर इतना समझ में आ गया था कि लड़की वालों से शादी में कुछ नहीं मांगना चाहिए, ये गंदी बात होती है। खुद खरीद कर ज़िंदगी शुरू करनी चाहिए। मुझे इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप में नौकरी मिल चुकी थी। मैंने पहले स्कूटर खरीदा, फिर कार। पर साइकिल नहीं खरीद पाया। पत्नी समझाती थी कि साइकिल कहां चलाओगे? ये दिल्ली है। यहां तेज़ रफ्त़ार से गाड़ियां चलती हैं। पत्नी की बात मैंने नहीं टाली। पर साइकिल मन में रह गई। फिर बेटा हुआ। बेटा थोड़ा बड़ा हुआ तो मैं उसे गाड़ी में बिठा कर साइकिल मार्केट गया। मैं पहली बार हैरान हुआ था ये देख कर कि इतनी सारी साइकिलें? लाल, काली, हरी, ब्लू, सफेद रंग की साइकिलें? बड़ों के लिए अलग, बच्चों के लिए अलग साइकिलें? हमारे समय तो एक ही साइकिल मिलती थी। काली साइकिल। जब मैं छोटा था तो कैंची स्टाइल में साइकिल चलाता था। मतलब पांव सीट तक नहीं पहुंचते थे तो एक हाथ सीट पर फंसा कर नीचे लटक कर ही साइकिल चला लेता था। पर अब तो साइकिल का बाज़ार बहुत बड़ा हो चुका था। बेटे के लिए मैंने एक छोटी साइकिल ली। मैं उस पर बैठ नहीं सकता था, पर मन बहुच मचला था कि काश अपने लिए भी एक साइकिल खरीद लेता! बेटा और बड़ा हुआ। स्कूल से निकल कर वो चला गया दिल्ली आईआईटी। आईआईटी में जाते ही उसने फरमाइश की कि पापा एक साइकिल लेनी है। आईआईटी में कार या मोटरसाइकिल नहीं चला सकते। हॉस्टल से क्लासरूम तक जाने के लिए सभी साइकिल इस्तेमाल करते हैं। मैं उछल पड़ा। वाह! साइकिल? हम बाज़ार गए। पत्नी को साथ लेकर नहीं गया। सिर्फ मैं और मेरा बेटा। हमने वहां से दो साइिकलें खरीदीं। एक बेटे के लिए, दूसरी अपने लिए। बेटे ने पूछा कि पापा आप कहां चलाएंगे? "मैं घर की छत पर चलाऊंगा।" बेटा हंस पड़ा था। पत्नी दो साइकिलें देख कर हैरान हो गई। “संजय, तुम कब बड़े होगे?” मैंने कहा कि मैं सुबह-सुबह अपनी सोसाइटी के कैंपस में साइकिल चलाऊंगा, तो पतला हो जाऊंगा। तुम चाहती हो न कि मैं पतला हो जाऊं! पत्नी ने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा कर रह गई। मैंने पहले दिन अपनी साइकिल तीसरे माले से नीचे उतारी। सुबह-सुबह हाफ पैंट पहन कर साइकिल चलाने लगा। मुहल्ले के कई लोग साइकिल देख कर मेरे पास आए। सब हैरान थे। पर उस हफ्ते मैंने नोट किया कि मेरे मुहल्ले में बहुत से बड़े लोग अपने लिए साइकिल खरीद लाए थे। मतलब कोई बड़ा नहीं हुआ था। मर्सडीज, बीएमडब्लू और ऑडी कार वाले साइकिल पर। साइकिल सबका पहला प्यार है। मेरे मन में था कि कभी मैं साइकिल की फैक्ट्री में जाऊंगा। देखूंगा कि साइकिल बनती कैसे है। संजय सिन्हा कुछ सोच लें और उनकी इच्छा पूरी न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? कल मैं लुधियाना आया। मैं जब दिल्ली से लुधियाना के लिए निकला था तो कई लोगों ने मुझसे पूछा लुधियाना में कहां जा रहे हो, संजय? मैं जा रहा हूं ओंकार सिंह पाहवा जी से मिलने। “अच्छा 'एवन साइकिल' वाले?” कल देर शाम मैं जीटी रोड होते हुए लुधियाना पहुंचा और होटल पहुंचने से पहले सीधे एवन साइकिल की फैक्ट्री पहुंच गया। मैं इतना उतावला था साइकिल फैक्ट्री देखने के लिए कि न समय का ध्यान रहा, न लंबी यात्रा की थकावट का। सबसे पहले मिला सरदार जी से। सरदार ओंकार सिंह पाहवा अपने कमरे मैं बैठे थे। उन्हें पता था कि संजय सिन्हा उनसे मिलने आ रहे हैं। मुझे थोड़ी देर हो गई थी। सरदार जी को कहीं जाना था, पर वो मेरा इंतज़ार कर रहे थे। ओ जी, एक बार मिला और साइकिल की कहानी शुरू हुई तो बातें खत्म ही नहीं हुई। पटना की मेरी यादें। पटना की सरदार जी की यादें। उनके कई रिश्तेदार पटना में रहते हैं। उनकी एवन साइकिल की एक फैक्ट्री पटना के पास हाजीपुर में भी है। उन्होंने पूरी कहानी सुनाई कि कैसे बंटवारे के बाद उनके पिता ने लुधियाना से बिजनेस की शुरूआत की और कैसे बाद में सभी के बिजनेस अलग-अलग होते चले गए और एवन साइकिल, संजय सिन्हा के सपनों की साइकिल, विजय भैया को दहेज में मिली साइकिल की फैक्ट्री सरदार जी के हिस्से आई। सरदार जी ने जी-तोड़ मेहनत की और पूरी दुनिया में ‘एवन’ का डंका बजवा दिया। पता नहीं कितने हज़ार करोड़ की कंपनी बन गई, पता नहीं कितनी हज़ार साइकिलें यहां रोज़ बनती हैं। मैंने उनके मैनेजर से पूछा था तो मैनेजर साहब ने बताया कि रोज़ दस हज़ार से अधिक साइकिलें बनती हैं। सब बिक जाती हैं। पूरी दुनिया में पहुंचती हैं उनकी साइकिलें। मतलब हर जगह संजय सिन्हा हैं। पूरी फैक्ट्री घूम कर जब लौट रहा था तो सरदार जी के ऑफिस के बाहर एक बोर्ड पर मेरी नज़रें रुक गईं। वहां लिखा था, “इंतज़ार करने वालों को सिर्फ उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं।” इन दो पंक्तियों में जीवन का सार बसा है। सरदार जी का अनुभव बसा है। संजय सिन्हा की कोशिशें बसी हैं। सरदार जी साइकिल के संसार में 'एवन' हैं और संजय सिन्हा कहानियों के संसार में। दोनों ने अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी हैं। कोशिशों का ही नतीजा था कि मैं अपनी पहली साइकिल के निर्माता से मैं मिल रहा था। साक्षात। सामने। सरदार जी के मैनेजर ने बताया कि एक साइकिल में 289 पार्ट्स होते हैं और पूरी साइकिल ऑटोमेटिक मशीन से बनती है। वैसे ही जैसे कार बनती हैं। कार-स्कूटर का क्रेज़ समय-समय पर कम ज़्यादा हो हुआ है, लेकिन साइकिल का क्रेज़ कभी कम नहीं हुआ। पहले ये सिर्फ सवारी थी। अब स्टेटस भी है। मोटर-कार से गियर गायब हो रहे हैं, साइकिलें गियर वाली आ रही हैं। साइकिल है सदा के लिए। मैंने सरदार जी से पूछा था कि क्या आपका मन कभी कुछ और करने का नहीं किया? सरदार जी ने मेरी ओर देखा और धीरे से बोले- संजय जी, “जुनून आपसे वो करवाता है, जो आप कर नहीं सकते। हौसला आपसे वो करवाता है जो आप करना चाहते हैं। अनुभव आपसे वो करवाता है जो आपको करना चाहिए। जुनून, हौसला और अनुभव तीनों ज़िंदगी के गियर हैं। जिसने इन तीनों के साथ तालमेल बिठा लिया, उसकी साइकिल तो चल ही पड़ेगी। #SanjaySinha #ssfbFamily

209 views

Recent Posts

See All

एक दिन

एक दिन ——— वो भागे जा रहे हैं। हम सब भाग रहे हैं। हम सारा दिन जीने की तैयारी में व्यस्त हैं। इतना कि जीने की फुर्सत ही नहीं। क्यों भाग रहे हैं, नहीं मालूम। कहां भाग रहे हैं, ये भी नहीं मालूम। मालूम है

बड़ा होना

नरेश ग्रोवर भैया अपने दोस्त के साथ एक उद्योगपति से मिलने गए थे। मैं जानता हूं कि आप तुरंत पूछ बैठेंगे कि नरेश ग्रोवर भैया कौन? देखिए, आप अपने परिजन हैं और आपको हक है मुझसे कुछ भी पूछने का। और मुझे अच्

  • srttnjopr5lqq3ttmf6t.jpg
  • White Facebook Icon
  • White YouTube Icon
  • White Twitter Icon
  • White Instagram Icon
Quick Links

About ssFBfamily

© 2018 by Sanjay Sinha

Developed by www.studymantrasolutions.com