• Sanjay Sinha

जीवन चक्र



अमेरिका में रहते हुए मुझे कुछ महीने हो चुके थे। लंबे समय तक वहां रहने के लिए सोशल सिक्योरिटी नंबर की ज़रूरत पड़ती है। यही नंबर आपकी पहचान है।

मैं सोशल सिक्योरिटी नंबर के आवेदन के लिए वहां ऑफिस गया था। वहां मुझे एक छोटा-सा फॉर्म भरने के लिए दिया गया। कुल जमा चार सवाल- नाम, पता, उम्र, और पिता का नाम।

इतने महत्वपूर्ण नंबर के लिए इतना छोटा-सा फॉर्म? मैं बहुत हैरान था। मैंने वहां काम करने वाले एक कर्मचारी से पूछा भी इसमें क्या इतनी ही जानकारी आपको चाहिए?

कर्मचारी ने मेरी ओर देख कर कहा कि हां, इतनी ही जानाकारी चाहिए और आप इस फॉर्म को भी नहीं भर सकते तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता।

उसने बहुत शालीनता से मेरे सवाल का जवाब दिया था। उसका कहना था कि ये नंबर यहां के लोगों के जीवन का आधार है। पर आपको ये छोटा-सा फॉर्म भरना आना चाहिए।

मैं फॉर्म भर कर चला आया था। कुछ दिनों बाद घर पर ही मेरा सोशल सिक्योरिटी कार्ड बन कर चला आया था। मैं जब भी उस कार्ड को देखता, मन में सोचता, जीवन का आधार इतना ही आसान होना चाहिए।

कल मैं भोपाल में अग्निहोत्र आश्रम गया। मैं भोपाल में कई साल रहा हूं। पर मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना था। लेकिन जब से फेसबुक पर अपना परिवार बना है, मुझे नित नई जानकारी मिलती है, मुझे जगह-जगह से निमंत्रण मिलता है नई चीज़ों को देखने का।

अग्निहोत्र आश्रम जाते ही मेरी मुलाकात वहां की संचालिका नलिनी माधव जी से हो गई। शांत, सरल नलिनी बहन मेरे सामने बैठी थीं। मैं मन ही मन सोच रहा था कि वो मुझे आश्रम के बारे में लंबी-चौड़ी कहानी सुनाएंगी। वेदों का पाठ पढ़ाएंगी। पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने ही पूछा कि अग्निहोत्र का अर्थ क्या है?

उन्होंने बहुत धीरे से कहा, “जो अग्नि में आहुति देता है, वही अग्निहोत्र है। यानी जो वेद को मानता है, वेद की शक्ति को समझता है, यज्ञ में आहुति के विज्ञान को परखता है, वही अग्निहोत्र है।”

“इसका क्या मतलब? यज्ञ में आहुति सब थोड़े दे सकते हैं? ये तो पुजारी, पंडितों का काम है।”

नलिनी जी मेरी बात सुन कर न चौंकी, न परेशान हुईं। उन्होंने कहा, “हम यहां कुछ नहीं करते। लोगों को सिर्फ इतना बताते हैं कि हमारे वेद कैसे हमें प्रकृति से जुड़ना सिखलाते थे। उन्होंने वेद और उसके मंत्रों को संक्षेप में परिभाषित करते हुए कहा कि इसके मंत्र जीवनी शक्ति हैं। यानी इनमें वो ताकत है जिससे हम जीवन में विभिन्न प्रकार के कार्य कर सकते हैं। जीवन शक्ति के कम होने या घटने से हम बीमार होते हैं या जीर्ण रोग हमारी जीवन शक्ति को सीमित कर देते हैं। अंग्रेजी में इसे ही वाइरल फोर्स कहा गया है।”

उन्होंने हमें बताया कि उनके पिता माधव स्वामी साहब ने वेद, उसके मंत्रों और हवन की महिमा को समझा था। उन्होंने ये माना था कि अग्नि को आहुति देने में जीवन का सबसे बड़ा दर्शन छिपा हैं। अग्नि में आहुति देने का सीधा अर्थ है प्रकृति से लिए को उसको लौटाना। माधव स्वामी जी का जन्म 1915 में विदिशा में हुआ था और स्कूल कॉलेज की पढ़ाई करके नौकरी में आने के बाद 39 साल की उम्र में उन्हें अग्नि में आहुति का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने पहले इसे खुद करना शुरू किया और फिर उनके जीवन में जो बदलाव आए, उससे लोगों को अवगत करना शुरू किया।

उन्होंने दो छोटे-छोटे मंत्रों और दो मिनट की इस आहुति का जीव जगत पर गंभीर परिणाम देखा। उन्होंने माना कि इससे प्रकृति में जीवनी शक्ति का विकास होता है।इससे मौसम चक्र संतुलित होता है। पशु-पक्षियों का व्यवहार सामान्य और संतुलित रहता है। पेड़-पौधों …. रंग-रूप और गुणवत्ता में सुधार होता है। उन्होंने पाया कि वेदों के मंत्रों से आश्चर्यजनक परिणाम होते है, जो सुनने में अविश्वसनीय लगते हैं। उन्होंने पाया कि जिस तरह पदार्थ जगत से उर्जा को प्राप्त करने के लिए विस्फोट किया जाता है, उसी तरह चेतना जगत में मंत्रों से उर्जा प्राप्त की जाती है। इन मंत्रों से विशेष ध्वनि कंपन का जन्म होता है और इस कंपन से वातावरण और हमारे शरीर में विद्युत धारा का जन्म होता है। यही है जीवनी शक्ति।

इतना सब सुनने के बाद मैंने पूछा कि अग्नि में आहुति का ताम-झाम?

कुछ नहीं। बस हम दिन में दो बार दो मिनट में इस आहुति को पूरा कर लेते हैं। चुटकी भर चावल, एक बूंद घी और दो प्रहर के दो छोटे-छोटे मंत्र अग्नि को समर्पित कर देते हैं। न कोई गुरू, न कोई पंडा। न माथे पर तिलक न कुछ और। बस समय का पालन अनिवार्य है। सुबह ठीक सूर्योदय के समय और शाम को ठीक सूर्यास्त के वक्त। दोनों के बहुत छोटे-छोटे मंत्र हैं। जीवन से रोज़ पांच मिनट नहीं, चार मिनट निकालने हैं।

मैं चुप था। नलिनी जी कह रही थीं कि आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों को ऐसा करके खुद को प्रकृति से जोड़ा है।

भाव इतना ही है - तेरा तुझको अर्पण।

इसका कोई वैज्ञानिक आधार?

यकीनन।

यही 1 और 2 दिसंबर की रात थी। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कंपनी से जहरीली गैस निकली थी। हज़ारों लोगों की जान इसमें गई थी। पर कुछ लोग जो न भाग पाए, न कुछ और कर पाए, उन्होंने अग्नि को आहुति देने का काम किया। मुझे फिजिक्स, केमेस्ट्री नहीं पता, पर कई परिवार, जिन्होंने ये किया, उनके घर जहरीली गैस का असर नहीं हुआ। वो गैस पीड़ित नहीं हुए।

विदेश से लोग आए थे उनकी जांच करने। आहुति से ऐसी कौन सी चीज़ निकली जिससे गैस का ज़हर ही मिट गया, इस पर उन्होंने शोध भी किया।

वो कह रही थीं कि संजय जी, यज्ञ का हमारे धर्म ग्रंथों में काफी लंबा-चौड़ा विवरण है। पर हम अपने ग्रंथों को भूल कर पश्चिम में खो गए और इसी कारण हमने अपना पर्यावरण बिगाड़ लिया है।

मेरा यकीन कीजिए, अग्निहोत्र पर लिखने को मेरे पास अभी बहुत कुछ है। पर फिलहाल इतनी-सी कहानी ही आपको सुना रहा हूं। मौका मिला तो पूरी कहानी फिर सुनाऊंगा। अभी तो इतना ही कहूंगा कि जो प्रकृति को लौटाने के लिए चार मिनट भी नहीं निकाल पाए, उसकी कोई क्या मदद कर सकता है?

अगली बार आप भोपाल आएं तो बैरागढ़ स्थित इस आश्रम में एक बार जीवन चक्र को समझने के भाव से ज़रूर जाइएगा।

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