• Sanjay Sinha

दिल में तुम्हे बिठा कर

Updated: Nov 24, 2018


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स्कूल के रास्ते में ही मुझे पता चल गया था कि मेरे घर भाई आया है। तालाब किनारे पतली-सी सड़क पर दौड़ता हुआ मैं घर पहुंचा था। अप्रैल का महीना था, स्कूल में गर्मी की छुट्टी होने से पहले सुबह की क्लास शुरू हो चुकी थी। सुबह स्कूल जाना, दस बजे से पहले ही घर चले आना। आते-आते पुतुल मिल गई थी, बता रही थी कि तुम्हारी मां को बेटा हुआ है। मैं घर पहुंचा। बहुत से लोग घर में थे। मां भीतर के कमरे में थी। मर्द लोगों को कमरे में जाने नहीं दिया जा रहा था। पर मैं मर्द थोड़े न था? मैं कमरे में चला गया था। मेरा छोटा भाई मां की बगल में लेटा था। मां सो रही थी। पुतुल की मां, बुआ, दादी सब मां के पास थीं। पुतुल की मां गाना गा रही थीं। “ओ सासू जी, जरा ललना उठा लो, तभी तो दादी कहेगा मेरा ललना रे…। ओ ननद जी, जरा ललना उठा लो, तभी तो बुआ कहेगा मेरा ललना रे।” मैं समझ गया था, जो-जो मेरे भाई को गोद में उठाएगा, मेरा भाई उन्हें पहचानेगा। दादी उठाएंगी तो वो दादी को पहचानेगा, बुआ उठाएंगी तो वो बुआ को पहचानेगा। ये रिश्तों का पहला पाठ था मेरे लिए। मैं भी मचला था अपने भाई को गोद में उठाने के लिए। मुझे भी मेरा भाई भईया बुलाएगा। मां ने आंखें खोली थीं। मुझे देख मुस्कुराई थी। बुआ मुझे गोद में उठा ली थीं। “तेरा भाई आया है रे…।” “मुझे गोद में उठाने दो इसे।” “अभी नहीं। अभी बहुत छोटा है। और अभी तो तू मेरी गोद में है।” “मैं क्यों? मैं तो आपको पहले से बुआ बुलाता हूं। पुतुल की मां तो कह रही थीं कि जो बच्चे को गोद में उठाएगा, बच्चा सिर्फ उसे पहचानेगा।” बुआ खिलखिला कर हंसी थीं। सामने का एक दांत नहीं था। मेरी तरह। मेरा दांत तो चूहा ले गया था। बुआ का दांत भी चूहा ही ले गया होगा। घर में चूहे थे। मैंने खुद देखा था। रसोई से निकल कर खिड़की से बाहर जाते हुए। मैंने सोच लिया था कि कभी न कभी चूहे को पकड़ कर दांत ले आऊंगा। पर अभी नहीं। अभी तो मैं रिश्ते जी रहा था। मां शाम को जागी थी। मैंने भाई को छू कर देखा था। एकदम मुलायम था। मैंने मां से पूछा था कि क्या रिश्ते गोद में उठाने से बनते हैं? मां ने हंसते हुए कहा था, “रिश्ते मन में बिठाने से बनते हैं।” “मां, मैं जब बड़ा होऊंगा तो रिश्तों वाले स्कूल में मेरा एडमिशन करा देना। मैं सिर्फ रिश्तों की पढ़ाई करूंगा।” “वो तो तुम पढ़ ही रहे हो मेरे साथ।” और उसी दिन मेरा एडमिशन मां की रिश्तों की पाठशाला में हो गया था। रिश्तों को दिल में बिठाना पड़ता है। जो रिश्ते दिल में बैठ जाते हैं, वो चाहे जैसे रिश्ते हों, अपने हो जाते हैं। जो रिश्ते दिल में नहीं बैठते, वो एक घर में रह कर भी अपने नहीं होते। मां ने पहला पाठ यही पढ़ाया था। *** दो दिन पहले मैं लुधियाना गया था। होटल पार्क प्लाजा में ठहरा था। सुबह नाश्ता के बाद जैसे ही रेस्त्रां से बाहर निकला, कोट-पैंट में एक आदमी मेरे सामने आया। “आप संजय सिन्हा हैं न?” “जी, मैं संजय सिन्हा।” “मैं अतुल गुप्ता। होटल का मैनेजर। मुझे पता चला कि आप हमारे होटल में ठहरे हैं।” “हां, ठहरा हूं। इसमें ख़ास बात क्या है?” “जी, पर इसमें ख़ास बात है। आप हमारे मेहमान हैं।” “हां, वो भी हूं। पर आप मुझे कैसे जानते हैं?” “सर, मैं आपके फेसबुक परिवार का सदस्य हूं। रोज़ आपकी कहानियां फेसबुक पर पढ़ता हूं। मेरी पत्नी भी आपकी परिजन है। आपसे मुलाकात नहीं हुई, पर आप हमारे दिल में रहते हैं। हम रोज़ आपकी कहानियां पढ़ते हैं। आपसे हम रिश्तों को जीना सीखते हैं।” मैं एकदम हैरान था। मां ने कहा था जो रिश्ता दिल में बैठ जाता है, उसी से रिश्ता होता है। ये भाई मुझे दिल में बिठाए बैठा है। ये तो मेरा रिश्तेदार हुआ। और फिर एक-एक करके फ्रंट डेस्क के सभी स्टाफ सामने आए। संजय सिन्हा, संजय सिन्हा। सब गले मिले। सबने तस्वीरें खिंचवाईं। और वादा लिया कि अगली बार जब लुधियाना जाऊंगा तो उनके घर भी जाऊंगा। रिश्ते गोद में उठाने से नहीं, दिल में बिठाने से बनते हैं। पुतुल की मां उस दिन गाना गा रही थीं, “ओ सासू जी, जरा ललना उठा लो, तभी तो दादी कहेगा मेरा ललना रे…। ओ ननद जी, जरा ललना उठा लो, तभी तो बुआ कहेगा मेरा ललना रे।” ललना को गोद में उठाना तो रिश्तों को समझने का पहला पाठ है। दूसरा और फाइनल पाठ है रिश्तों को दिल में बिठाना। #SanjaySinha #ssfbFamily

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