• Sanjay Sinha

बड़ा होना

Updated: Nov 29, 2018



नरेश ग्रोवर भैया अपने दोस्त के साथ एक उद्योगपति से मिलने गए थे।

मैं जानता हूं कि आप तुरंत पूछ बैठेंगे कि नरेश ग्रोवर भैया कौन? देखिए, आप अपने परिजन हैं और आपको हक है मुझसे कुछ भी पूछने का। और मुझे अच्छा लगता है आपको कुछ भी बताना।

नरेश ग्रोवर भैया अपने जबलपुर में रहते हैं, सत्य अशोक होटल के मालिक हैं और आप सबके प्रिय कमल ग्रोवर भैया के बड़े भाई हैं।

मैं जब भी जबलपुर आता हूं, नरेश ग्रोवर भैया से ज़रूर मिलता हूं। उनके साथ बैठने का मतलब है ज़िंदगी की कहानियों से रुबरू होना।

कल मैं उनके साथ बैठा था। उन्होंने बात ही बात में मुझे एक पुराना प्रसंग सुनाया। एक ऐसा प्रसंग जिसे सुन कर मैं खुद को रोक नहीं पा रहा उसे आपसे साझा करने से।

नरेश भैया मुझे बता रहे थे कि बहुत साल पहले वो अपने एक मित्र के साथ दिल्ली में किसी बड़े उद्योगपति के घर गए थे।वो उनके दोस्त के दोस्त थे। वहां उद्योगपति मित्र ने नरेश भैया और उनके दोस्त की खूब आवभगत की। शाम का समय था। दिल्ली में तो बात-बात में लोग शराब पीने का बहाना ढूंढते हैं। यहां तो पुराने मित्र से उस उद्योगपति की मुलाकात हो रही थी। उद्योगपति मित्र ने इन दोनों से पूछा कि आप कोई ड्रिंक लेना पसंद करेंगे?

नरेश भैया के दोस्त ने कहा कि एक छोटा पैग लिया जा सकता है।

पर नरेश भैया ने शराब लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वो नहीं पीते।

उद्योगपति मित्र ने नौकर को आवाज़ लगाई और कहा कि दो पैग शराब और दो गिलास संतरे का जूस ले आओ।

नरेश भैया हैरान थे। वो मन में सोच रहे थे कि हम तीन लोग हैं। दो पैग शराब और दो गिलास जूस। इसका क्या मतलब हुआ? आख़िर ये किस तरह का हिसाब हुआ?

वो सोच ही रहे थे कि नौकर चार गिलास सामने रख गया। दो पैग शराब और दो गिलास जूस।

उद्योगपति मित्र ने एक पैग नरेश भैया के दोस्त के हाथों में दिया। नरेश भैया की ओर जूस का गिलास बढ़ाया।

नरेश भैया जब मुझे ये कहानी सुना रहे थे, मेरे कान इस रहस्य को जानने को उतावले हो रहे थे कि उनका उद्योगपति मित्र चौथे गिलास का क्या करेगा?

क्या उसने एक बार में ही दो गिलास जूस नरेश भैया के लिए मंगवा दिए? पर क्यों? जूस तो पड़े-पडे़ कड़वा हो जाएगा।

नरेश भैया मिनट भर को रुके। फिर उन्होंने कहा कि उस उद्योगपति मित्र ने शराब के गिलास को उठाया, होठों से लगाया और रख दिया। फिर उसने कहा कि वो भी शराब नहीं पीते। क्योंकि वो शराब नहीं पीते, इसलिए उन्होंने जूस के दो गिलास मंगवाए थे।

जब वो शराब नहीं पीते तो फिर मंगवाने का क्या औचित्य था?

उन्होंने कहा कि जब किसी को शराब ऑफर की जाती है तो आप ये नहीं कह सकते कि आप खुद नहीं पीते। ये एक तरह का अक्खड़पन होता है। ये सामने वाले का अपमान होता है। इसलिए जब भी उनका कोई साथी घर आता है और वो पीना पसंद करता है, तो वो उसे ऑफर करते हैं, खुद के लिए भी मंगाते हैं, होठों से गिलास को लगाते हैं पर पीते नहीं। इससे सामने वाला खुद को सहज पाता है।

इतनी-सी कहानी सुना कर नरेश भैया ने मुझसे कहा कि संजय जी, बड़प्पन एक भाव है। ये कहानी बहुत पुरानी है पर मेरे दिल में ये बात बैठ गई। पहले मुझसे कोई पीने को कहता था तो मैं बहुत बेरुखी से मना करता था। ऐसा करते हुए मेरे मन में ये भाव होता था कि नहीं पीने वाले पीने वाले से अच्छे होते हैं। अपनी अच्छाई का अहंकार मुझे बेरुखा बनाता था।

मैंने उस बहुत बड़े उद्योगपति से एक बात सीखी।

नरेश भैया खुद बहुत बड़े उद्योगपति हैं। उन्होंने किसी और से कौन सी ऐसी बात सीखी, जिसे वो संजय सिन्हा से साझा करने जा रहे हैं?

मैं चुपचाप उनकी ओर देख रहा था।

नरेश भैया ने मुस्कुराते हुए कहा कि आदमी को काम बड़ा करना चाहिए, दिखावा छोटा करना चाहिए। जो लोग दिखावे में फंस जाते हैं, वो कभी बड़ा काम नहीं कर पाते।

आप जानते हैं कि इसके आगे मेरी उंगलियां खुद फड़फड़ाने लगीं पूरी बात आप तक पहुंचाने के लिए।

आज कोई कहानी नहीं। कोई ज़रूरी नहीं कि मैं रोज़-रोज़ कहानी ही सुनाऊं।आज मैं आपसे एक ऐसा ज्ञान साझा कर रहा हूं, जिसे नरेश भैया ने बहुत साल पहले सीखा किसी दूसरे बड़े आदमी से। कल संजय सिन्हा ने यही बात सीख ली नरेश भैया से। आज वो ज्ञान आपके सामने है।

बड़प्पन धन से नहीं, मन से होता है।

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