• Sanjay Sinha

बेटियों वाली मां

बेटियों वाली मां ------------

मेरी सास की उम्र अस्सी पार है। वो दिल्ली में अकेली रहती हैं। तीन कमरों का उनका फ्लैट तीसरे माले पर है। वो अभी जहां रहती हैं, कुछ साल पहले तक हमारा फ्लैट भी उसी मुहल्ले में था, लेकिन तीन साल पहले हम वहां से दूसरे मकान में शिफ्ट हो गए। हमारा फ्लैट भी पहले तीसरे माले पर था, पर अब हमारा नया फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर है। मेरी सास मुझसे बहुत प्यार करती हैं। अगर मैं कहूं कि मेरी सास मुझे अपनी बेटी से अधिक मानती हैं, तो आप बिल्कुल हैरान मत होइएगा। ये एक सार्वजनिक सत्य है कि मेरी सास मुझे अपनी दोनों बेटियों से अधिक मानती हैं। मेरी सास की दो बेटियां हैं। दोनों की शादी हो चुकी है। बड़ी वाली बेटी मेरी पत्नी है और छोटी वाली मेरे साढ़ू भाई की पत्नी है। दोनों बेटियों का घर मां के घर से दूर है। जिस दिन मुझे पुराने मुहल्ले से यहां शिफ्ट होना था, मैंने बहुत कोशिश की कि मेरी सास भी हमारे साथ नए घर में चली आएं। हमारे साथ रहें। हमारा घर बड़ा है, ग्राउंड फ्लोर पर है। वो मुझे पसंद करती हैं, मैं उन्हें पसंद करता हूं। ऐसे में उनका साथ हमारे लिए बहुत सुखद रहता। आप तो जानते ही हैं कि संजय सिन्हा मां के बेटे हैं। उनकी आत्मा मां में अटकी रहती है। बचपन से मां की कमी ही खलती रही तो जहां मां मिल गई, वहां संजय सिन्हा का संसार बस जाता है। मेरी पत्नी की मां मेरी मां हैं। मैं उन्हें मां ही बुलाता हूं। ऐसे में मुझे जब-जब उनके साथ रहने का मौका मिलता है, मैं खुश हो जाता हूं। मैंने बहुत चाहा कि मेरी सास हमारे साथ रहने चली आएं। पर वो तैयार नहीं हुईं। कहने लगीं कि अभी देह चल रही है। जब नहीं चलेगी, तब देखा जाएगा। मैंने कई बार उन्हें समझाया कि आपकी उम्र इतनी हो गई है। आप अकेली हैं। आपको किसी तरह की तकलीफ हो जाए तो मुश्किल हो जाएगी। प्लीज़ हमारे साथ रहिए। पर वो नहीं मानती हैं। जिस फ्लैट में मेरी सास रहती हैं, उसमें लिफ्ट नहीं है। वो रोज़ तीसरे माले से दिन में चार बार सीढ़ियों से नीचे उतरती हैं। कुछ-कुछ लाने के लिए। कभी नीचे वाले पड़ोसियों से मिलने के लिए और शाम को रोज़ टहलने के लिए। चार बार तो मैंने गिना है, कभी-कभी उनका उतरना चढ़ना इससे अधिक भी होता है। वो रोज़ तीनों टाइम अपने लिए खाना-नाश्ता बनाती हैं। ग्रीन लीफ वाली चाय बना कर पीती हैं और सुबह-सुबह अंग्रजी का अखबार पढ़ती हैं। मैंने तमाम अकेले बुड्ढों को देखा है कि वो कभी नहाते हैं, कभी देर से नहाते हैं। सुबह का बना शाम को खा लेते हैं, शाम का सुबह। उनकी कोई दिनचर्या नहीं होती। पर मेरी सास रोज़ सुबह तैयार होती हैं। चाय बनाती हैं, बॉलकनी में बैठ कर अखबार पढ़ती हैं, अकेले बैठ कर सुडोकू खेलती हैं। फिर अपने लिए नाश्ता बनाती हैं, खाना बनाती हैं। महिलाओं की उम्र पर चर्चा नहीं करनी चाहिए इसीलिए मैंने उन्हें अस्सी पार लिखा है। वर्ना अस्सी से कई साल ऊपर हैं। मैंने उनसे एक दिन पूछा था कि आप इतनी बार तीसरे माले ऊपर-नीचे करती हैं, अकेली रहती हैं, आपको बुरा नहीं लगता? मेरी सास ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि मैं बेटियों की मां हूं। बेटों की नहीं। “मतलब?” “मतलब ये बेटा जी, कि जब मेरी दो बेटियां हुईं तो मैंने मन को समझा लिया कि एक दिन दोनों बेटियां शादी करके अपने-अपने घर चली जाएंगी। जब मन मान गया कि बेटियां चली ही जाएंगी, तो फिर हमें अकेले रहना है।” जब मेरी शादी हुई थी तब मेरे ससुर जी भी थे। पर अब वो नहीं हैं। सास अकेली हैं। उन्होंने कहा कि बेटियों की मां के घुटने मजबूत होते हैं। वो सौ साल की उम्र तक तीसरे माले पर चढ़ सकती हैं, उतर सकती हैं। बेटों की मांओं के घुटने पचास साल में दुखने लगते हैं। कमर अकड़ने लगती है। “वज़ह?” “वज़ह ये कि बेटों की मांओं के मन में शुरू से बैठा होता है कि एक दिन बहू आएगी, सेवा करेगी। बहू आती है। सेवा करती है तो ठीक है। नहीं करती है तो फिर बेटों की मां की ज़िंदगी दूभर होने लगती है। पहले मन टकराता है, फिर तन। बेटों की मांएं अकेले जीने की तैयारी नहीं करती। मैं अकेली खुश हूं। क्योंकि मैंने मन को बहुत पहले मना लिया था कि मुझे तो अेकेले ही रहना है। मैं अगर आपके पास रहने लगूंगी तो बीमार पड़ जाऊंगी।” इसका मतलब आप हमारे साथ नहीं चलेंगीं? “जब तक ईश्वर ने इस लायक बनाए रखा है, तब तक निभने दो। फिर की फिर देखेंगे।” कल अपनी परिजन रेणु यादव ने मेरे कमेंट बॉक्स में लिखा कि वो पिछले दो दिनों से संजय सिन्हा की कहानी नहीं पढ़ पाई थीं। प्रेम पर लिखी दो दिनों की कहानियां उन्होंन इकट्ठी पढ़ीं। उन्होंने लिखा कि कहानी नहीं पढ़ पाने की वज़ह ये रही कि दो दिन पहले सुबह-सुबह वो छत पर पौधों में पानी डाल रही थीं कि उनकी निगाह नीचे सड़क पर एक महिला पर गई। महिला बदहवास-सी सड़क पर इधर-उधर झुक-झुक कर कुछ चुन रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो होश में न हो। उन्हें लगा कि कहीं आती-जाती किसी गाड़ी से महिला टकरा न जाए। वो भाग कर नीचे गईं ये देखने के लिए कि आख़िर ये महिला कौन है? ऐसे क्यों भटक रही है? जब वो महिला के पास गईं तो उन्हें ये देख कर बहुत हैरानी हुई कि वो तो लक्ष्मी है। लक्ष्मी कई साल पहले उनके ही घर काम करती थी। हैरान रेणु जी ने लक्ष्मी को पहचाना। लक्ष्मी ने रेणु जी को। रेणु जी ने कहा कि तुम मेरे घर चलो तो लक्ष्मी कहने लगी कि आपका घर ऊपर है। सीढ़ी चढ़ने में दम फूलता है। बहुत मुश्किल से वो उसे सीढ़ी चढ़ा कर अपने घर लेकर आईं। उसे सोफे पर बिठाया। थोड़ी देर में लक्ष्मी कुछ बोलने लायक हुई तो उन्होंने पूछा कि तुम अकेली इस तरह सड़क पर क्यों डोल रही हो? सड़क पर बार-बार क्या ढूंढ रही थी? किसी गाड़ी से टकरा कर मर जाती तो? लक्ष्मी ने जो बताया उसे सुन कर चाहे आप दुखी हों और कह बैठें कि हे राम! ये कैसा कलयुग आ गया है? पर यही हकीकत है। लक्ष्मी ने जो कहानी रेणु जी को सुनाई वो हमारे देश में अधिकतर बेटों वाली मांओँ की कहानी है। लक्ष्मी की एक बेटी है, एक बेटा। दोनों की शादी हो चुकी है। बेटे की शादी से पहले तक तो सब ठीक था। पर शादी के बाद लक्ष्मी की अपनी बहू से नहीं बनी। बहू से नहीं बनी तो बेटे की नज़रों में भी मां खटकने लगी। नतीजा ये हुआ कि मां सुबह की चाय के लिए भी तरसने लगी। अब मैं सास बहू की कहानी आपको सुनाने लगूंगा तो आप कहेंगे कि संजय सिन्हा रोज़-रोज़ घर-घर की कहानी सुनाने लगते हैं। अभी तो इतना ही सुन लीजिए कि लक्ष्मी की बेटी मां को घर बुलाती है, पर मां उसके घर नहीं जाती क्योंकि उन्हें लगता है कि दामाद के घर भला कैसे रहा जा सकता है? बेटा अपनी मां को नहीं पूछता। बहू सताती है। लक्ष्मी ने बताया कि कई बार मन में आया कि गले में रस्सी बांध कर लटक जाऊं। पर मर जाना आसान होता है क्या? अब वो सुबह-सुबह सड़क पर इधर-उधर गिरे लोहे के टुकड़े ढूंढती है ताकि किसी चाय वाले को देकर सुबह एक कप चाय पी ले। मुझे नहीं लगता कि आज इससे अधिक आपको कुछ कहने की ज़रूरत है। मेरी पत्नी की सास नहीं है। बचपन से ही नहीं है। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर मेरी पत्नी की भी अपनी सास से नहीं बनती तो मैं क्या करता? मैं सोच नहीं पा रहा कि मैं क्या करता। पर इतना कह सकता हूं कि जो बेटे अपनी मां को नहीं पूछते, वो नहीं जानते कि वो क्या खो रहे हैं। रही बात बेटियों की मां की, उन्हें किसी की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। #SanjaySinha #ssfbFamily

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