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ये परिवार है। वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांतों को जीने वाला परिवार।
ये परिवार कैसे बना? 
संजय सिन्हा अपने छोटे भाई के अचानक निधन के बाद टूट गए थे। टूटा हुआ आदमी जीता कहां है?
जीने की कोई न कोई वज़ह होनी चाहिए। 
और वज़ह बन गए आप। भाई के इस संसार से चले जाने के आठ महीने बाद 12 नवंबर 2013 को संजय सिन्हा ने तय किया कि रोज़ फेसबुक पर एक कहानी लिखेंगे। 
वो लिखने लगे। लोग पसंद करने लगे। और फिर तय हुआ कि वर्चुअल संसार के लोग आपस में मिलें।
सभी मिले। दुनिया भर के लोग मिले। दिल्ली में  12 नवंबर 2013 को दुनिया भर से हज़ारों लोग एक-दूसरे से मिलने आए। उसी दिन ये परिवार बना। संजय सिन्हा फेसबुक परिवार। #ssfbFamily.
अब सवाल है कि #SanjaySinha कौन हैं? क्या है उनका परिचय?
वो कहते हैं -“मैं कौन हूं? मेरा परिचय क्या है? किसी को नहीं पता होता कि वो कौन है। मुझे भी नहीं पता कि मैं कौन हूं।
अगस्त की बारिश में मेरा जन्म हुआ था, इतना मां ने बताया था। मां ने ये भी बताया था कि मैं उसकी उम्मीदों की संतान हूं। 
क्योंकि जो भी इस संसार में आता है, उसे एक नाम मिलता है, तो मुझे भी नाम मिला। संजय। संजय सिन्हा। 
हर बच्चे को स्कूल जाना होता है, मैं भी स्कूल गया। पर मेरी शिक्षा जितनी हुई, मां की गोद में हुई। मां की कहानियों में हुई। जब मैं बारह साल का हुआ तो मां को भगवान जी ने अपने पास बुला लिया। शायद मेरी मां की ज़रूरत उन्हें मुझसे अधिक रही होगी।
फिर पिताजी ही मां बन बन गए। 
मैं स्कूल गया, कॉलेज गया। पटना से भोपाल गया, भोपाल से दिल्ली चला आया। यहीं मुझे जनसत्ता में नौकरी मिल गई। 
फिर मैं पता नहीं कैसे कलम-स्याही को छोड़ कर कैमरा हाथ में उठा कर ज़ी न्यूज़ में रिपोर्टर बन गया। 
कारगिल युद्ध में सैनिकों के साथ तोपों की धमक के बीच कदमताल किया। बिल क्लिंटन जब अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो उनके पीछे-पीछे भारत और बांग्लादेश की यात्रा की। उड़ीसा में आए चक्रवाती तूफान में हजारों शवों के बीच जिंदगी ढूंढ़ने की कोशिश भी मैंने की। 
सबसे आहत करने वाला सफर तो रहा गुजरात का, जहां 26 जनवरी 2001 को धरती कांप उठी थी। उस कंपन ने मेरी जिंदगी की परिभाषा ही बदल दी। तब गुजरात का सफर था तो बतौर रिपोर्टर लेकिन वापसी हुई एक खालीपन, एक उदासी और एक इंतजार के साथ। ये इंतजार बाद में एक उपन्यास के रूप में सामने आया - ‘6.9 रिक्टर स्केल’। 
11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क में ट्विन टावर को ध्वस्त होते और 10 हजार जिंदगियों को शव में बदलते देखने का दुर्भाग्य भी मेरे ही हिस्से आया। 
कल्पना चावला जिस स्पेस शटल से आसमान से अमेरिका की धरती पर उतरने वाली थीं, उसे टेक्सास में मलबा बन कर बिखरना भी इन्हीं आंखों का दुर्भाग्य था। चार साल के अमेरिका प्रवास में पता नहीं ज़िंदगी ने क्या-क्या दिखलाया। 
सौ से अधिक देश घूमने के बाद, वहां रुकने के बाद लगा कि सचमुच सारे जहां से अच्छा अपना हिदुस्तान ही है। बस तब से हिंदुस्तान में हूं। 
कोई एक शहर, एक गांव मेरा नहीं। सब मेरे हैं, मैं सबका हूं। जब मन में आता है, अपना झोला उठा कर कहीं भी निकल पड़ता हूं।
कहते हैं कठिनाइयों से बढ़ कर इस संसार में कोई दूसरा विश्वविद्यालय नहीं। 
मैं कठिनाइओं के विश्वविद्यालय में पढ़ कर निकला हूं। 
साल 2013 में 2 अप्रैल की वो मनहूस सुबह थी, जब पुणे से किसी ने फोन करके मुझे बताया था कि मेरा छोटा भाई अचानक इस संसार से चला गया है। उसे ऑफिस में ही हृदयघात हुआ था। 
उसके बाद ज़िंदगी रुक गई। उसके बाद से मुझे कुछ भी याद नहीं। अब मैं मैं नहीं हूं। अब मैं परिवार हूं।  संजय सिन्हा फेसबुक परिवार। हम सब एक-दूसरे के परिजन हैं। 

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